घटना


कामागाटा मारू की कहानीसिर्फ एक अकेली "घटनाहोने से कहीं ज़्यादा,कनेडियन सरकार द्वारा जानबूझ कर बनाई गयी भेदभावपूर्ण नीति को दर्शाती है। इसका मकसद ग़ैर-यूरोपीय, "अयोग्यजातियों को कनाडा में प्रवेश देने से रोकना था। ऐसे नसलभेदी इरादों का प्रसार "प्रगती", "सामाजीक विकासऔर"उपयुक्ताकी आड़ में किया गया जिससे यह विचार पुख्ता हुआ कि कनाडा एक"गोरों का देश हैऔर ऐसा बना रहना चाहिए।

मई २३, १९१४ को हांगकांग से रवाना हुआ कामागाटा मारू समुद्री जहाज़जो की ३७६ यात्रियों को लेकर चला था और जिसमें ज़्यादातर सवार यात्री पंजाब और ब्रिटिश राज से थेवेंकूवर की बरार्ड इनलेट वाली बंदरगाह पर पहुंचा। यात्रीजो कि सभी ब्रिटिश रियासत की प्रजा थेकनाडा की नसलभेदी लगातार यात्रा नीति को चुनौती दे रहे थे। इस नीति में प्रावधान था कि सिर्फ वही प्रवासी कनाडा आ सकते हैं जो अपनी जन्मभूमी या नागरिकता वाले देश से पहले टिकट खरीदकर चलेंगे और फिर अपनी यात्रा में कहीं भी विराम ना देते हुए सीधे आयेंगे। ये नियम १९०८ में लागू किया गया ताकि प्रवासी भारतीय कनाडा ना आ सकें। ऐसे में कनाडा के अधिकारियों ने कामागाटा मारू को बंदरगाह से कुछ दूर समुद्र में ही रोक दिया और किसी भी यात्री को कनाडा में पाँव रखने नहीं दिया। आखिरकारसिर्फ २० वापस मुड़ने वाले निवासियों और जहाज़ के डॉक्टर और उनके परिवार को कनाडा में प्रवेश करने की इजाज़त दी गयी। लगभग दो महीने के गतिरोध के बादजहाज़ को जुलाई २३१९१४ के दिनकनेडियन नौसेना द्वारा बलपूर्वक वापस लौटा दिया गया। जब ये जहाज़ कोलकता से कुछ मील दूरबज बज बंदरगाह पर आ लगा तो वहां पुलिस ने यात्रियों को घेरकर उनपर गोलियों की वर्षा शुरू कर दी। इससे १९ व्यक्ती मारे गए और बहुत से लोगों को बंदी बना लिया गया।